!! एक परदेशी की कहानी !!
१). जो घर से दूर होते हैं, बड़े मजबूर होते हैं...
कभी बागो में सोते हैं, कभी छुप-छुप कर रोते हैं...
घरों को याद करते हैं, कभी फ़रियाद करते हैं...
मगर जो बेसहारा होते हैं, घरों से बेकिनारा होते हैं..!
२). उन्हें घर कौन देता है..? यह खतरा कौन लेता है...
बड़ी मुश्किल से एक कमरा, जहाँ न कोई रहता हो..
नगर से पार मिलता है, बड़ा बेकार मिलता है ..
तो फिर दो तीन हम जैसे मिला लेते हैं सब पैसे..
और आपस में कहते हैं, कि मिलजुल कर ही रहते हैं..!
३). कोई खाना बनाएगा, कोई झाड़ू लगाएगा...
कोई धो लेगा सब कपडे, तो रह लेंगे सब खुल के...
मगर गर्मी भरी रातें, तापस अलवार सौगातें...
ऊपर से गजब करना, घुटन और हवस का पहरा..
थकन से चूर होते हैं, सुकून से दूर होते हैं...!
४). बहुत जी चाहता है तब, कि माँ को भेज दे या रब..
जो अपनी गोद में ले ले, हमे ठंडी हवा दे दे..
सुला दे नींद वो ऐसी, कि इक पल को भी न टूटे..
मगर कुछ भी नहीं होता , तो कर लेते हैं समझौता..!
५). कोई दिल में बिलखता है, कोई पहरों सुलगता हैं..
जब अपना काम करके हम, पलटते हैं तो आँखें नम,..
खुशी महदूद रहती है, फिजा मग्मून रहती है...
बहुत रंज क्यूँ और न हो, बड़े मजबूर क्यूँ न हो...!
६). अबद में महीने के, सब अपने खून पसीने के..
जो पैसे जोड़ लेते हैं, घरों को भेज देते हैं...
और अपने ख़त में लिखते हैं, हम अपना ख्याल रखते हैं..
खुशी वक़्त-ए-घड़ियाँ हैं, यहाँ खुशियाँ ही खुशियाँ हैं ...!